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राज्यसभा के चुनाव में मध्य प्रदेश के चुनाव अधिकारी ने कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र निरस्त किया है। चुनाव आयोग द्वारा मध्य प्रदेश के तीन राज्य सभा के सदस्यों का निर्विरोध निर्वाचन होने का प्रमाण पत्र दे दिया है। इसके पहले मीनाक्षी नटराजन द्वारा चुनाव अधिकारी द्वारा उनके नामांकन को निरस्त करने के मामले में चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट तक की दौड़ लगाई। किंतु उन्हें कहीं से न्याय नहीं मिला। सुप्रीम कोर्ट ने मीनाक्षी नटराजन की याचिका पर शुक्रवार को निरस्त कर दी है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने कोई आदेश नहीं दिया। चुनाव अधिकारी द्वारा महेश केवट को निर्वाचित घोषित कर दिया। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने मामले में चुनाव पिटीशन हाईकोर्ट में दाखिल करने की बात कहकर याचिका का निराकरण कर दिया है। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और निवृत्तमान राज्यसभा सदस्य दिग्विजय सिंह ने गंभीर आरोप लगाया है। इस सीट चोरी में राज्य सरकार, केंद्र सरकार, चुनाव आयोग तथा सुप्रीम कोर्ट भी साजिश में शामिल हैं। इस तरह का आरोप पहली बार किसी राजनेता द्वारा सुप्रीम कोर्ट पर लगाया गया है।
एसआईआर के मामले में लंबे समय तक सुप्रीम कोर्ट में बिहार विधानसभा चुनाव के पहले ही सुनवाई शुरू हो गई थी। सुनवाई के दौरान कई विधानसभाओं के चुनाव हो गए। कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है। चुनाव आयोग को एसआईआर करने का अधिकार है। चुनाव आयोग को नागरिकता तय करने का अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट से जो फैसला आया है, उसे विधि विशेषज्ञों द्वारा आधा अधूरा बताया जा रहा है। चुनाव आयोग ने करीब 6.50 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए हैं। पश्चिम बंगाल के चुनाव में जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ट्रिब्यूनल में लाखों मतदाताओं ने अपील की है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह कह दिया, इस बार यदि मतदान नहीं कर पाएंगे, तो अगली बार कर देंगे। पश्चिम बंगाल चुनाव के जो परिणाम आए हैं। उसमें एक करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से अलग किए गए। चुनाव आयोग द्वारा कोई पारदर्शिता नहीं बरती गई। चुनाव आयोग किसी आपत्ति का जवाब नहीं देता है। सुप्रीम कोर्ट में मामला रहते हुए 6.50 करोड़ लोगों के मतदान के अधिकार छिन गए, इसे वोट चोरी से जोड़ा गया। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने राज्यसभा के चुनाव में गलत तरीके से नामांकन निरस्त कर भाजपा उम्मीदवार महेश केवट को चुनाव जिताने के लिए जो साजिश रची गई, उस साजिश में सुप्रीम कोर्ट शामिल है, यह कहकर भारतीय न्यायपालिका को कटघरे में खड़ा कर दिया है। इसके साथ कांग्रेस इस मामले को लेकर न्यायपालिका के स्थान पर जनता की अदालत में न्याय मांगने के लिए सड़कों पर उतरने की बात कह रही है। भारतीय संविधान और लोकतंत्र के लिए यह सबसे चिंताजनक स्थिति है। आम जनता के बीच में वोट चोरी की चर्चा होने लगी है। सरकार कहती है, यदि असहमत हैं, तो कोर्ट चले जाएं। कोर्ट जाने के बाद फैसला कई वर्षों तक नहीं होता है।
तारीख पर तारीख पड़ती रहती है। महाराष्ट्र में जिस तरह से ठाकरे सरकार को गिराया गया था। उसके बाद तारीख पर तारीख हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और विधानसभा के बीच में मैच होता रहा। समय खत्म हो जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट से फैसला आता है, असंवैधानिक तरीके से महाराष्ट्र सरकार गिराई गई थी। राज्यपाल की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट ने प्रश्नचिन्ह लगाया था। उसके बाद भी महाराष्ट्र की सरकार बनी रही, शिवसेना और एनसीपी तोड़ दी गई। बिहार विधानसभा के चुनाव के पहले एसआईआर में जो विसंगतियां ही रहीं थीं। उसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई होती रही। मतदाता सूची से नाम कटते रहे, बिहार में भाजपा और एनडीए में शामिल राजनीतिक दल चुनाव जीत गये। कुछ इसी तरह की स्थिति पश्चिम बंगाल में हुई है। इन घटनाओं के बाद राजनीतिक दलों और आम आदमी का विश्वास न्यायपालिका से उठने लगा है। चर्चाओं में यह कहा जाने लगा है, न्यायपालिका वही निर्णय देती है, जो सरकार चाहती है। ऐसी स्थिति में कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दल विभिन्न संगठन जनता की अदालत में जाने की बात कर रहे हैं।
भारतीय न्यायपालिका के लिए यह एक कठिन समय है। न्याय व्यवस्था पर राजनीतिक दलों का विश्वास खत्म हो गया? ऐसी स्थिति में भीड़तंत्र स्वयं न्याय करने के लिए आगे आ गया, तो यह स्थिति भारतीय संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सबसे खराब होगी। जब तक लोग कानून और नियमों का पालन करते हैं, तभी तक कानून का राज कायम रहता है। जिन लोगों के लिए नियम और कानून बनाए गए हैं। यदि वह उनका पालन नहीं करना चाहें, ऐसी स्थिति में सेना और पुलिस एवं अन्य व्यवस्था भीड़ का मुकाबला नहीं कर सकती है। यह स्थिति अराजकता की ओर ले जाती है। पूर्व के वर्षों में श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल एवं अन्य राष्ट्रों में इस तरह के कई मामले सामने आ चुके हैं। भीड़तंत्र के आगे सब बेबस होते हैं। दिग्विजय सिंह ने सीधे-सीधे सुप्रीम कोर्ट पर सीट चोरी की साजिश में शामिल होने का जो आरोप लगाया है। यह आरोप ऐसे समय पर लगाया है, जब आम लोगों में न्यायपालिका के प्रति अविश्वास बढ़ रहा है। न्यायपालिका पर एक के बाद एक आरोप लगते चले जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करने की बात कहकर, याचिका की समय पर सुनवाई नहीं की। याचिकावार्ता का गलत तरीके से नामांकन निरस्त किया गया है, उसको लेकर वह न्याय मांगने गया। उसे सुप्रीम कोर्ट से भी जब न्याय नहीं मिला। जहां से न्याय मिल सकता था, सभी दरवाजों को खटखटा लिया था। इसके बाद एक ही विकल्प उसके पास रह जाता है, वह जनता की अदालत में जाएं। जनता की अदालत से न्याय प्राप्त करें। इस स्थिति का निर्माण न्यायपालिका के कारण हो रहा है। न्यायपालिका को इसे स्वीकार करना होगा। 6.50 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाकर उनके नागरिक अधिकारों को खत्म कर दिया गया, सुप्रीम कोर्ट इस मामले में न्याय नहीं कर पाई। अब नागरिकों एवं राजनैतिक दलों के पास दूसरा विकल्प नहीं है। उन्हें अपने अधिकारों की रक्षा के लिये स्वयं एकजुट होकर संघर्ष करना होगा।
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