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ऊर्जा संकट के बीच चीन की रणनीति

बीजिंग। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने जहां पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट और सप्लाई चेन की बाधाओं को लेकर चिंता पैदा कर दी है, वहीं दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक होने के बावजूद चीन इस स्थिति में अपेक्षाकृत सुरक्षित नजर आ रहा है। बीजिंग की दीर्घकालिक ऊर्जा नीतियों और दूरदर्शी निवेश ने उसे वैश्विक झटकों को सहने की शक्ति प्रदान की है। चीन ने बीते कई वर्षों में कच्चे तेल का विशाल रणनीतिक भंडार तैयार किया है, जो किसी भी आपात स्थिति में उसकी औद्योगिक गतिविधियों को निर्बाध रूप से चलाने में सक्षम है।

चीन की इस मजबूती का एक बड़ा कारण ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों पर उसका असाधारण नियंत्रण है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जल विद्युत के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश कर चीन ने पारंपरिक ईंधनों पर अपनी निर्भरता को काफी हद तक कम कर लिया है। इसके अलावा, तकनीकी नवाचार के मामले में भी चीन ने एक कदम आगे बढ़ते हुए कोयले से आवश्यक केमिकल बनाने की विधि विकसित की है। इस तकनीक के माध्यम से मेथेनॉल और सिंथेटिक अमोनिया जैसे उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं, जिससे प्लास्टिक और रबर जैसे उद्योगों के लिए कच्चे तेल की आवश्यकता काफी घट गई है। परिवहन के क्षेत्र में आई क्रांति ने भी चीन को ऊर्जा सुरक्षा प्रदान की है। इलेक्ट्रिक वाहनों के तेजी से होते विस्तार के कारण पेट्रोल और डीजल की मांग में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। कल तक जो देश तेल खपत का सबसे बड़ा केंद्र था, वह अब इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में दुनिया का नेतृत्व कर रहा है। इसी बढ़ती क्षमता को देखते हुए वियतनाम और फिलीपींस जैसे पड़ोसी देशों ने भी ऊर्जा संकट के दौरान चीन से सहयोग की अपेक्षा जताई है। चीन ने भी दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर साझेदारी की इच्छा जाहिर की है।

हालांकि, चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। चीन आज भी अपनी तेल जरूरतों का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए ही पूरा करता है। लेकिन जिस तरह उसने ऊर्जा विविधीकरण और भंडारण की नीति अपनाई है, उससे वह अन्य विकसित देशों की तुलना में काफी बेहतर स्थिति में है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन में तेल और गैस की खपत अब स्थिरता की ओर बढ़ रही है, जो इस बात का प्रमाण है कि उसने वैश्विक अस्थिरता के बीच खुद को एक सुरक्षित ऊर्जा घेरे में खड़ा कर लिया है।

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